चीन प्लस वन रणनीति का लाभ उठाने में भारत का पिछड़ना

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13-Jan-2025 10+

चीन प्लस वन रणनीति का लाभ उठाने में भारत का पिछड़ना

चीन प्लस वन रणनीति का लाभ उठाने में भारत का पिछड़ना

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प्रिलिम्स के लिये:

चीन प्लस वन रणनीति,

मेन्स के लिये:

चीन प्लस वन रणनीति का लाभ उठाने में भारत के लिये अवसर और चुनौतियाँ, भारत द्वारा उठाए गए कदम उसे चीन के विकल्प के रूप में प्रस्तुत करते हैं।

 

चर्चा में क्यों?

 

हाल ही में जारी नीति आयोग की ट्रेड वॉच रिपोर्ट में अमेरिका-चीन व्यापार संघर्ष और 'चीन प्लस वन' रणनीति के आलोक में भारत की व्यापार संभावनाओं, चुनौतियों और विकास क्षमता पर प्रकाश डाला गया है।

  • इसमें कहा गया है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा अपनी आपूर्ति शृंखलाओं में विविधता लाने और जोखिम कम करने के लिये अपनाई गई 'चीन प्लस वन' रणनीति का लाभ उठाने में भारत को "अभी तक सीमित सफलता" मिली है।

चीन प्लस वन रणनीति में भारत को "सीमित सफलता" क्यों मिली है?

  • प्रतिस्पर्द्धात्मक नुकसान और नियामक चुनौतियाँ: 
    • इसके अतिरिक्त, भ्रष्टाचार के कारण निवेशकों का विश्वास कम हुआ है, लेन-देन की लागत बढ़ी है, तथा भ्रष्टाचार विरोधी प्रयासों के बावजूद, निवेश गंतव्य के रूप में भारत की अपील कम हुई है।
    • वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया और मलेशिया जैसे देशों ने चीन से दूर जाने की चाहत रखने वाली बहुराष्ट्रीय कंपनियों को आकर्षित करने के लिये  सस्ते श्रम, सरल कर कानूनों और कम टैरिफ का लाभ उठाया है।
    • भारत के जटिल नियम, नौकरशाही बाधाएँ, असंगत नीतियाँ और उच्च श्रम लागत निवेश को बाधित करते हैं, तथा धीमा प्रशासन एवं अप्रत्याशित सुधार व्यवसाय प्रतिस्पर्द्धा को कम करते हैं।
  • मुक्त व्यापार समझौते (FTA): 
    • वियतनाम, थाईलैंड, कंबोडिया और मलेशिया जैसे दक्षिण एशियाई देश मुक्त व्यापार समझौतों (FTA) पर हस्ताक्षर करने में अधिक सक्रिय रहे हैं, जिससे उन्हें अपने निर्यात हिस्सेदारी का विस्तार करने में मदद मिली है। 
    • FTA पर बातचीत करने और उसे अंतिम रूप देने में भारत की धीमी गति ने उसे नुकसान पहुँचाया है।
  • भू-राजनीतिक तनाव और सीमित बाज़ार हिस्सेदारी:
    • वैश्विक व्यापार में भारत की सीमित हिस्सेदारी (वैश्विक व्यापार के 70% में 1% से भी कम) अप्रयुक्त क्षमता को उज़ागर करती है। 
    • जबकि भू-राजनीतिक तनाव, जैसे कि अमेरिका-चीन व्यापार संघर्ष, भारत को एक तटस्थ विकल्प के रूप में उभरने के अवसर प्रदान करते हैं, वे अनिश्चितता भी पैदा करते हैं, व्यापार रणनीतियों को जटिल बनाते हैं और बाज़ार विस्तार में बाधा डालते हैं।
  • आपूर्ति शृंखला व्यवधान:
    • चीन पर अमेरिकी निर्यात नियंत्रण और टैरिफ ने आपूर्ति शृंखलाओं को खंडित कर दिया है, जिससे भारत को अवसर मिला है। हालाँकि, निम्न बुनियादी ढाँचे, अकुशल बंदरगाहों और उच्च रसद लागतों ने भारत की विदेशी निवेश आकर्षित करने की क्षमता को सीमित कर दिया है।
  • कार्बन टैक्स जोखिम और भूमि अधिग्रहण के मुद्दे:
    • यूरोपीय संघ की कार्बन सीमा समायोजन प्रणाली (CBAM) के कारण भारत के लौह और इस्पात निर्यात की लागत बढ़ने तथा प्रतिस्पर्द्धात्मकता कम होने का खतरा है। 
    • इसके अतिरिक्त, भारत की जटिल कर व्यवस्था और धीमी भूमि अधिग्रहण प्रक्रिया से व्यवसाय लागत बढ़ती है, औद्योगिक परियोजनाओं में देरी होती है और विकास में बाधा आती है।

'चाइना प्लस वन' रणनीति क्या है?

  • परिचय: 
    • चाइना प्लस वन (अथवा चाइना+1) रणनीति से तात्पर्य उन वैश्विक प्रवृत्ति से है जिसमें कम्पनियाँ चीन से बाहर के देशों में परिचालन स्थापित करके अपनी विनिर्माण एवं आपूर्ति शृंखला में विविधता ला रही हैं। 
    • इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक देश पर अत्यधिक निर्भरता से उत्पन्न होने वाले जोखिम को कम करना है, जो विशेष रूप से भू-राजनीतिक तनाव और आपूर्ति शृंखला व्यवधानों के कारण हो सकता है।
  • चाइना प्लस वन रणनीति की पृष्ठभूमि:
    • चीन "विश्व कारखाना":
      • दशकों से चीन वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं का केंद्र रहा है तथा अपने अनुकूल उत्पादन कारकों और सुदृढ़ व्यापारिक पारिस्थितिकी तंत्र के कारण इसे "विश्व का कारखाना" कहा जाता है। 
      • 1990 के दशक में, अमेरिका और यूरोप की कंपनियों ने अल्प विनिर्माण लागत और इसके व्यापक घरेलू बाज़ार पहुँच के कारण अपना उत्पादन चीन में स्थानांतरित किया था।
    • महामारी के दौरान व्यवधान:
      • हालाँकि, चीन की शून्य-कोविड नीति के कारण औद्योगिक लॉकडाउन, आपूर्ति शृंखला में अस्थिरता और कंटेनर की कमी के हुई जिसके परिणामस्वरूप कोविड-19 महामारी के दौरान गंभीर व्यवधान उत्पन्न हुए। 
  • चाइना प्लस वन रणनीति का क्रमिक विकास:
    • चीन की शून्य-कोविड नीति, आपूर्ति शृंखला व्यवधान, उच्च माल ढुलाई दर और लंबी लीड टाइम सहित कई कारकों के संयोजन से अनेक वैश्विक कंपनियाँ "चाइना-प्लस-वन" रणनीति अपनाने के लिये प्रेरित हुईं। 
    • इसमें चीन पर निर्भरता कम करने के लिये विनिर्माण को भारत, वियतनाम, थाईलैंड, बांग्लादेश और मलेशिया जैसे अन्य वैकल्पिक देशों में स्थानांतरित किया जाना शामिल है।

चाइना प्लस वन रणनीति के अंतर्गत भारत के लिये प्रमुख विकास चालक क्या हैं?

चीन प्लस वन रणनीति के तहत संभावित भारतीय क्षेत्र को लाभ

  • फार्मास्यूटिकल्स: वर्ष 2024 में 3.5 लाख करोड़ रुपए के मूल्यांकन के साथ, भारत विश्व का तीसरा सबसे बड़ा फार्मास्युटिकल उत्पादक होगा, जो WHO की वैक्सीन आवश्यकताओं का 70% आपूर्ति करता है और अमेरिका की तुलना में 33% कम विनिर्माण लागत प्रदान करता है।
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आगे की राह 

  • संरचनात्मक सुधार: विनियमनों को सुव्यवस्थित करना, व्यापार को सुकर बनाना तथा सड़क परिवहन की उच्च लागत को कम करने के लिये रसद दक्षता को बढ़ाना, जो वर्तमान में 60% माल ढुलाई का संचालन करता है।
    • वियतनाम और मलेशिया जैसे देशों द्वारा अपनाई गई रणनीतियों को अपनाना, जैसे सस्ता श्रम, सरल कर कानून और औद्योगिक विकास के लिये पुनर्वितरित भूमि।
  • विशिष्ट औद्योगिक क्लस्टर: क्षेत्रीय प्रतिस्पर्द्धात्मकता बढ़ाने के लिये विश्व स्तरीय बुनियादी अवसरंचना, प्लग-एंड-प्ले सुविधाओं और साझा सेवाओं के साथ समर्पित विनिर्माण केंद्र विकसित करना।
  • कौशल विकासव्यावसायिक प्रशिक्षण को मज़बूत करना, STEM शिक्षा को बढ़ावा देना तथा उच्च तकनीक विनिर्माण की मांगों को पूरा करने के लिये कार्यबल को उन्नत बनाना।
  • क्षेत्रीय विनिर्माण को बढ़ावा: कपड़ा, चमड़ा, ऑटो घटक एवं फार्मास्यूटिकल्स में ताकत का लाभ उठाते हुए, मोबाइल फोन और रक्षा जैसे उभरते क्षेत्रों में दीर्घकालिक कर प्रोत्साहन प्रदान करना तथा विकास को समर्थन देना।

निष्कर्ष

  • 'चीन प्लस वन' अवसर को प्राप्त करने की भारत की यात्रा में कई चुनौतियाँ शामिल हैं, जिनमें प्रतिस्पर्द्धात्मक नुकसान, विनियामक बाधाएँ और क्षेत्र-विशिष्ट मुद्दे शामिल हैं। हालाँकि, बुनियादी अवसरंचना में रणनीतिक निवेश, विनियामक सुधारों और नवाचार पर ध्यान केंद्रित करके भारत वैश्विक आपूर्ति शृंखला परिदृश्य में स्वयं को एक व्यवहार्य विकल्प के रूप में स्थापित कर सकता है। आर्थिक विकास की संभावनाएँ महत्त्वपूर्ण हैं, लेकिन चुनौतियों को अवसरों में बदलने के लिये सक्रिय उपायों की आवश्यकता है।

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